"सत्यानुसंधानपरा लोककल्याणसेतवः आश्रित्य यत्स्थिता धीरास्तत्पदं मे प्रकाशताम्।          ‘जीवनसंदेशगीतांजलि’

देश के सांस्कृतिक और नैतिक विकास की नीति सुदृढ करने के लिए शैक्षिक स्तर पर संस्कृत का प्रश्रय लेना आवश्यक है। लोकोक्तियों और सुभाषितों के नीतिपरक श्लोक प्राचीन भारतीय छात्रों को सच्चरित्र तथा व्यवहारकुशल बनाने के महत्वपूर्ण साधन थे क्योंकि मस्तिष्क पर इनका गंभीर तथा स्थायी प्रभाव पड़ता है। राष्ट्रप्रेम से प्रभावित जनता भारत के सांस्कृतिक गौरव के प्रति भी सचेत है। अतः राष्ट्र-हित में संस्कृत का ज्ञान आवश्यक हो जाता है ताकि भारतीय संस्कृति की वास्तविकता भारतीय भारतीय चिंतन के यथार्थ-स्वरूप तथा भारतीय सभ्यता के रहस्यों से हमारा अधिकारी वर्ग विदेश जाने वाले छात्र एवं विदेश स्थित भारतीय संगठन और दूतावास भली-भाँति परिचित हों। तभी वे देश-विदेश में यथार्थ भारतीय व्यक्तित्व का प्रकाशन और प्रतिनिधित्व कर सकेंगे।उल्लेखनीय है कि आज पढाये जाने वाले प्रायः सभी विषयों का माध्यम अतीत में संस्कृत भाषा ही रही है, इस नजरिए से भारत के गौरवशाली अतीत को शिक्षा के स्तर पर संस्कृत को पढकर ही जाना जा सकता है। निष्कर्षतः राष्ट्र-हित में प्रत्येक भारतीय के लिए शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर संस्कृत का प्रचार-प्रसार आवश्यक है।


Dr. Preeti Kamal
Assistant Professor
M.A. (Allahabad University, Allahabad), NET
Ph.D.
(Allahabad University, Allahabad)